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ईद-उल-अजहा से पहले उत्तर प्रदेश में नमाज़ को लेकर मुस्लिम समुदाय में चिंता
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने सड़कों और खुले स्थानों पर नमाज़ को लेकर सख्ती बढ़ाई है। 18 मई को आदित्यनाथ ने कहा था कि मुसलमान ईद-उल-अजहा की नमाज़ “पाली में” अदा करें।
ईद-उल-अजहा से पहले उत्तर प्रदेश में नमाज़ को लेकर मुस्लिम समुदाय में चिंता
भारत में ईद अल-अजहा

उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले के मलियाना गांव में ईद-उल-अजहा की तैयारियों का माहौल इस बार उत्साह से ज्यादा चिंता से भरा हुआ है। स्थानीय मस्जिद में जुटे करीब 50 लोगों के बीच कुर्बानी या त्योहार की रौनक से ज्यादा चर्चा इस बात पर हुई कि ईद की नमाज़ कहां, कैसे और किन शर्तों के साथ अदा की जाएगी।

मस्जिद कमेटी के सदस्यों ने लोगों से अपील की कि वे मस्जिद के बाहर भीड़ न लगाएं, अगर जगह भर जाए तो अगली पाली का इंतज़ार करें, बहस से बचें और किसी भी उकसावे पर प्रतिक्रिया न दें। कई लोग पुलिस की ओर से जारी सलाहों और स्थानीय संदेशों को मोबाइल पर देखते रहे, जिनमें सार्वजनिक स्थानों पर नमाज़ से बचने की बात कही गई है।

मलियाना का इतिहास पहले से ही संवेदनशील रहा है। मई 1987 में यहां 72 मुसलमानों की हत्या हुई थी। 36 साल की सुनवाई के बाद 2023 में अदालत ने सबूतों की कमी के आधार पर कई आरोपियों को बरी कर दिया था। लेकिन इस बार चिंता पुरानी हिंसा से नहीं, बल्कि हाल के वर्षों में सार्वजनिक नमाज़ को लेकर बढ़े दबाव से जुड़ी है।

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों ने सड़कों, पार्कों और खुले मैदानों में मुसलमानों की नमाज़ का विरोध तेज़ किया है। उनका कहना है कि इससे यातायात और सुरक्षा से जुड़ी समस्या पैदा होती है। वहीं मुस्लिम समुदाय का कहना है कि कई इलाकों में मस्जिदों और ईदगाहों में सभी नमाज़ियों के लिए पर्याप्त जगह नहीं होती, इसलिए लोग कुछ देर के लिए बाहर या आसपास के खुले स्थानों पर नमाज़ अदा करते हैं।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने सड़कों और खुले स्थानों पर नमाज़ को लेकर सख्ती बढ़ाई है। 18 मई को आदित्यनाथ ने कहा था कि मुसलमान ईद-उल-अजहा की नमाज़ “पाली में” अदा करें। उन्होंने यह भी लिखा था, “प्यार से मानेंगे ठीक है, नहीं मानेंगे तो दूसरा तरीका अपनाएंगे।”

मुस्लिम समुदाय के कई लोगों का कहना है कि इस तरह के बयानों और पिछली कार्रवाइयों से डर का माहौल बन गया है। मेरठ के एक व्यक्ति ने अल जज़ीरा से कहा कि पिछले साल खुले स्थानों पर नमाज़ पढ़ने वालों पर मामले दर्ज किए गए थे और कुछ जगहों पर घरों को गिराने तथा पासपोर्ट सत्यापन और ड्राइविंग लाइसेंस से जुड़ी कार्रवाई की रिपोर्टें भी सामने आई थीं।

अलीगढ़ के एक दुकानदार आरिफ मलिक ने कहा कि पिछले साल ईद-उल-अजहा पर उनके इलाके में कुछ लोगों ने खुले मैदान में कुछ मिनट के लिए नमाज़ अदा की थी, लेकिन बाद में पुलिस ने नमाज़ियों को खदेड़ा। उनका कहना है कि इस बार परिवार लोगों से भीड़ से दूर रहने और किसी विवाद से बचने को कह रहे हैं।

कई मस्जिद कमेटियां अब ईद की तैयारियों को लेकर पुलिस के साथ पहले से समन्वय कर रही हैं। कुछ जगहों पर नमाज़ियों की संख्या सीमित करने, छोटे समूहों में आने और नमाज़ के तुरंत बाद लौट जाने की सलाह दी जा रही है। स्वयंसेवकों को मस्जिदों के बाहर भीड़ रोकने और लोगों को सड़कों पर फैलने से बचाने की जिम्मेदारी दी गई है।

मेरठ के एक मस्जिद कमेटी सदस्य मोहम्मद आरिफ ने अल जज़ीरा से कहा कि पहले ईद की सुबह खुशी का माहौल होता था, लेकिन अब लोग यह सोचकर तनाव में रहते हैं कि कहीं पुलिस न आ जाए या कोई वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर न डाल दे।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र नुमान खान ने कहा कि डर केवल शारीरिक कार्रवाई का नहीं, बल्कि अपमान और ऑनलाइन निशाने पर आने का भी है। उनके अनुसार, परिवार युवा लोगों से मस्जिदों के बाहर खड़े होने से भी बचने को कह रहे हैं, ताकि कोई विवाद न हो।

सहारनपुर के एक इमाम ने इन तैयारियों को “नुकसान नियंत्रण” बताया। उन्होंने कहा कि अब ईद की चर्चा से ज्यादा समय प्रतिबंधों और विवाद से बचने की रणनीति पर खर्च हो रहा है।

मुस्लिम पक्ष का कहना है कि ईद की नमाज़ कुछ ही मिनटों की होती है और जगह की कमी के कारण कभी-कभी लोग सड़क के किनारे तक पहुंच जाते हैं। उनका आरोप है कि अब इसे ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे मुस्लिम समुदाय सार्वजनिक स्थानों पर कब्जा करना चाहता हो।

ईद-उल-अजहा से पहले उत्तर प्रदेश में पैदा हुआ यह माहौल धार्मिक स्वतंत्रता, सार्वजनिक व्यवस्था और अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

स्रोत:Others
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