जनगणना 2027 की जनसंख्या गणना प्रक्रिया को चार चुनावी राज्यों में पहले शुरू करने के केंद्र सरकार के फैसले और जनगणना फॉर्म में कई नए सवाल जोड़े जाने के बाद पूर्व जनगणना अधिकारियों ने डेटा की गोपनीयता और उसके संभावित इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई है।
पूर्व अधिकारियों का कहना है कि जनगणना के दौरान जुटाए गए आंकड़ों की गोपनीयता हर हाल में सुनिश्चित की जानी चाहिए, खासकर तब जब जनगणना, नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर यानी NPR और आगे चलकर नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी NRC के संभावित संबंधों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में जनगणना के आंकड़ों का NRC तैयार करने में इस्तेमाल होने की ऐतिहासिक मिसाल मौजूद है। दस्तावेज बताते हैं कि 1951 में स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना के दौरान जनगणना शेड्यूल से डेटा “कॉपी” कर देशभर में NRC तैयार किया गया था।
हालांकि, उस समय देशव्यापी NRC प्रकाशित नहीं किया गया। इसे केवल अविभाजित असम में प्रकाशित किया गया था, जिसमें उस दौर में मणिपुर और त्रिपुरा भी शामिल थे।
पूर्व अधिकारियों की चिंता है कि यदि लोगों को यह आशंका हुई कि जनगणना में दी गई जानकारी का इस्तेमाल नागरिकता या मतदाता पहचान से जुड़ी प्रक्रियाओं में हो सकता है, तो इससे डेटा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
उनका कहना है कि जनगणना का उद्देश्य आबादी, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और सार्वजनिक नीति से जुड़े आंकड़े जुटाना होता है, इसलिए इसे नागरिकता जांच या प्रवर्तन प्रक्रिया से अलग रखा जाना चाहिए।
चार चुनावी राज्यों में जनसंख्या गणना चरण को आगे बढ़ाने के फैसले ने भी सवाल खड़े किए हैं। आलोचकों का कहना है कि चुनावी माहौल में संवेदनशील सवालों वाली जनगणना प्रक्रिया लोगों में अविश्वास पैदा कर सकती है।






















