भारतीय अधिकारियों का कहना है कि सिंधु जल संधि अपने मौजूदा स्वरूप में फिर से काम नहीं करेगी और इसे समीक्षा तथा पुनर्विचार की जरूरत होगी।
भारत ने 20 अप्रैल 2025 के पाकिस्तान के साथ संघर्ष के बाद इस संधि को “स्थगित” स्थिति में रखा था। एक अधिकारी ने ‘थ हिन्दू’ से कहा, “सिंधु जल संधि अपने मौजूदा रूप में दोबारा काम नहीं करेगी। अगर नदी जल बंटवारे से जुड़े प्रावधानों को फिर सक्रिय करना है, तो उन्हें किसी अलग रूप में करना होगा, मौजूदा रूप में नहीं।”
1960 में लागू हुई सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच नदी जल बंटवारे से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था मानी जाती रही है। लेकिन अधिकारी ने कहा कि बदली परिस्थितियों में भारत को इस संधि में बने रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में, पानी के बंटवारे के समझौते के लिए बातचीत 1950 के दशक की शुरुआत में शुरू हुई और 1960 में 'सिंधु जल संधि' के रूप में पूरी हुई।
इस संधि में छह नदियों को दो समूहों में बांटा गया है। तीन पूर्वी नदियां - रावी, ब्यास और सतलुज - भारत को दी गईं, जिनका इस्तेमाल भारत ज़्यादातर बिना किसी रोक-टोक के कर सकता है।
तीन पश्चिमी नदियां - सिंधु, झेलम और चिनाब - पाकिस्तान को दी गईं, हालांकि भारत को इनके पानी का इस्तेमाल सीमित मात्रा में, बिना पानी की खपत वाले कामों (जैसे पनबिजली बनाने) के लिए करने का अधिकार मिला।
2023 में, पाकिस्तान की रुकावटों का हवाला देते हुए भारत ने संधि में बदलाव की मांग की। जब पाकिस्तान ने संधि पर फिर से बातचीत करने से इनकार कर दिया, तो भारत ने एक निष्पक्ष विशेषज्ञ से दखल की मांग की, जबकि पाकिस्तान मध्यस्थता अदालत (कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन) चला गया। यह विवाद अभी भी चल रहा है।


















