ईंधन संकट से जूझते प्रवासी मजदूर, दिल्ली छोड़ने पर कर रहे विचार

भारत में 2011 की जनगणना और सरकारी अनुमानों के अनुसार 45 करोड़ से अधिक आंतरिक प्रवासी हैं, जो देश की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं।

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गैस की कमी के कारण कारखानों के थोड़े समय के लिए बंद रहने के बाद अपने गृहनगर लौट रहे कपड़ा श्रमिक ट्रेन में चढ़ने के लिए कतार में खड़े हैं। / AP

नई दिल्ली सहित देश के कई बड़े शहर इन दिनों एक गहराते ऊर्जा संकट का सामना कर रहे हैं। मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण ईंधन की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिससे आम लोगों के लिए रसोई गैस जैसी बुनियादी जरूरतें भी महंगी हो गई हैं।

इसका सबसे ज्यादा असर प्रवासी मजदूरों पर पड़ रहा है, जो अब बड़ी संख्या में अपने गांवों की ओर लौटने को मजबूर हो रहे हैं।

देशभर के रेलवे स्टेशनों पर इन दिनों असामान्य भीड़ देखी जा रही है। यह भीड़ किसी त्योहार या छुट्टियों की नहीं, बल्कि आर्थिक संकट के कारण हो रहे पलायन की है।

दिल्ली में काम करने वाले वेल्डर मोहम्मद तसलीम कहते हैं कि बढ़ती कीमतों ने उन्हें समय से पहले घर लौटने पर मजबूर कर दिया।

“हम इसलिए जा रहे हैं क्योंकि हमारे पास खाना बनाने के लिए गैस नहीं है। पहले 100 रुपये में मिलती थी, अब 500 रुपये में खरीदनी पड़ रही है। मैं मजदूर हूं, यहां रहना संभव नहीं, इसलिए घर जा रहा हूं,” उन्होंने कहा।

रसोई गैस की कमी और ऊंची कीमतों से लाखों मजदूर प्रभावित हैं। हालांकि सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने और विदेशों से एलपीजी आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई लोगों को अब भी गैस सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संकट लंबा चलता है, तो इसका असर सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी महंगाई बढ़ेगी। गांव लौटना फिलहाल एक विकल्प हो सकता है, लेकिन लंबे समय में यह स्थायी समाधान नहीं है।