भारत ने प्रवासी भारतीयों की बचत को आकर्षित करने के अभियान के तहत तीन महीने से भी कम समय में करीब 127 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह हासिल किया है। भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई ने बुधवार को यह जानकारी दी।
यह राशि “फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट डिपॉजिट” योजना के जरिए आई है। इस पहल के तहत बैंकों को अनिवासी भारतीयों को अधिक ब्याज दरों की पेशकश करने में मदद मिली।
आरबीआई के अनुसार, बैंकों ने 31 अगस्त तक डॉलर डिपॉजिट पहल के जरिए 127.23 अरब डॉलर जुटाए।
केंद्रीय बैंक ने बताया कि बाहरी वाणिज्यिक उधारी और विदेशी मुद्रा ऋण से 9.15 अरब डॉलर का प्रवाह आया। इसके साथ कुल विदेशी मुद्रा प्रवाह 136.377 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
भारत ने जून में विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने की यह कोशिश शुरू की थी। इसका उद्देश्य भारतीय रुपये पर दबाव कम करना था, जो ईरान युद्ध के कारण तेल कीमतों में संभावित बढ़ोतरी और बाहरी वित्तीय स्थिति को लेकर चिंताओं से प्रभावित हो रहा था।
इन कदमों से आरबीआई को अपने विदेशी मुद्रा भंडार को फिर से मजबूत करने में मदद मिली है। इससे केंद्रीय बैंक को रुपये की रक्षा के लिए अधिक गुंजाइश मिली, हालांकि अब तक रुपये में कोई बड़ी रिकवरी देखने को नहीं मिली है।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अगस्त की शुरुआत में कहा था कि प्रवासी भारतीयों से आने वाला प्रवाह “मजबूत” है और आरबीआई के मन में कोई तय “लक्ष्य” नहीं है।
हालांकि, कुछ दिनों बाद केंद्रीय बैंक ने घोषणा की कि वह डॉलर डिपॉजिट योजना को 31 अगस्त को समाप्त कर देगा। इससे पहले इसे सितंबर के अंत में बंद करने का फैसला किया गया था।
भारत के वित्त मंत्रालय ने पिछले सप्ताह कहा कि इस योजना ने 3.7 करोड़ मजबूत भारतीय प्रवासी समुदाय की शक्ति को रेखांकित किया है। मंत्रालय के अनुसार, प्रवासी भारतीयों ने एक बार फिर भारत की विकास यात्रा में अपनी आर्थिक और भावनात्मक हिस्सेदारी दिखाई है।
मंत्रालय ने कहा कि योजना को मिली प्रतिक्रिया इतनी “मजबूत” रही कि आरबीआई ने डिपॉजिट विंडो को समय से पहले बंद करने का फैसला किया।






















