भारत की वायु रक्षा के लिए S-400 सिस्टम की डिलीवरी में तेज़ी नजर आई।

भारत और रूस के बीच हुए लगभग 5.4 अरब डॉलर के समझौते के तहत कुल पांच S-400 सिस्टम मिलने हैं, जिनमें से तीन पहले ही तैनात किए जा चुके हैं।

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सेंट पीटर्सबर्ग के ड्वोर्त्सोवाया (पैलेस) स्क्वायर में विजय दिवस सैन्य परेड के पूर्वाभ्यास के दौरान रूसी एस-400 लॉन्चर का प्रदर्शन। / AP

भारत अपनी वायु रक्षा क्षमता को और मजबूत करने के लिए रूस से S-400 मिसाइल सिस्टम की डिलीवरी को तेज कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय वायुसेना की जरूरतों को देखते हुए शेष स्क्वाड्रनों की आपूर्ति में तेजी लाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

भारत और रूस के बीच हुए लगभग 5.4 अरब डॉलर के समझौते के तहत कुल पांच S-400 सिस्टम मिलने हैं, जिनमें से तीन पहले ही तैनात किए जा चुके हैं, जबकि बाकी की डिलीवरी 2026 तक पूरी होने की उम्मीद है।

S-400 एक अत्याधुनिक लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणाली है, जो 400 किलोमीटर तक के लक्ष्य को भेद सकती है और विमान, ड्रोन तथा बैलिस्टिक मिसाइल जैसे खतरों को रोकने में सक्षम है।

एक एस-400 रेजिमेंट में आमतौर पर दो बैटरी होती हैं और यह 128 मिसाइलों से लैस होती है, जिन्हें 380 किलोमीटर (236 मील) दूर तक के हवाई खतरों को निशाना बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इस प्रणाली में रडार इकाइयाँ और ऑफ-रोड परिवहन वाहन भी शामिल हैं।

रूस की वायु रक्षा प्रणाली, जिसमें एस-400 विमान शामिल हैं, पश्चिमी देशों द्वारा समर्थित यूक्रेन के साथ तीन साल से अधिक समय से चल रहे युद्ध के बाद दबाव में आ गई है।

भारत कभी रूसी रक्षा उत्पादों का एक प्रमुख ग्राहक हुआ करता था, जिसमें सु-30 जेट भी शामिल थे, जिनकी खरीद उसने 1996 में शुरू की थी। लेकिन हाल के वर्षों में, नई दिल्ली ने अपना ध्यान पश्चिमी और इजरायली हथियार निर्माताओं की ओर मोड़ दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्रीय तनाव और बदलते सुरक्षा माहौल के बीच भारत अपने रक्षा ढांचे को तेजी से मजबूत कर रहा है। हालांकि, रूस से रक्षा खरीद को लेकर अमेरिका के प्रतिबंध कानून (CAATSA) से जुड़े कूटनीतिक पहलू भी बने हुए हैं।

भारत S-400 के साथ-साथ स्वदेशी परियोजनाओं जैसे ‘प्रोजेक्ट कुशा’ पर भी काम कर रहा है, ताकि भविष्य में आत्मनिर्भर वायु रक्षा प्रणाली विकसित की जा सके।