एक नई अन्तर्राष्ट्रीय रिपोर्ट ने भारत की विकास दर के आकलन पर कुछ नए सवाल उठाए हैं
रिपोर्ट यह संकेत देती है कि भारत की अर्थव्यवस्था ने एक समान गति से वृद्धि नहीं की, बल्कि 2000 के दशक के मध्य में तेज़ उछाल के बाद वैश्विक वित्तीय संकट के चलते विकास दर धीमी हुई।
एक नई अन्तर्राष्ट्रीय रिपोर्ट ने भारत की विकास दर के आकलन पर कुछ नए सवाल उठाए हैं
पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट ने रिपोर्ट ने GDP आकलन पर कुछ नए सवाल उठाए / Reuters

एक इंटरनेशनल थिंक-टैंक पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स द्वारा मार्च 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट में भारत की पिछले दो दशकों की आर्थिक वृद्धि दर के पैमाने को लेकर निष्कर्ष सामने रखे गए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत की विकास दर से संकेत मिलता है कि कुछ अवधियों में आंकड़ों के मापन ने वास्तविक विकास गति के आकलन को प्रभावित किया हो सकता है।

जहां पिछले एक दशक से विशेषज्ञ दुनिया में जीडीपी के आकलन की पद्धति पर सवाल उठाते रहे हैं। भारत के संदर्भ में 2016 में नोटबंदी के बाद, जब अर्थव्यवस्था पर बड़े असर की उम्मीद थी, तब भी जीडीपी वृद्धि 8.3 प्रतिशत तक पहुंचने से इन शंकाओं ने व्यापक रूप लिया।

रिपोर्ट कहती है की 2019 में गैर-बैंकिंग वित्तीय संकट के दौरान भी आर्थिक गतिविधियों में गिरावट के बावजूद जीडीपी में केवल मामूली असर दिखा, जिससे संदेह और गहरा हुआ।

जून 2025 में, जब निजी निवेश और रोजगार सृजन कमजोर थे लेकिन जीडीपी मजबूत दिखाई दे रही थी, तब पूर्व सांख्यिकी अधिकारियों ने भी आंकड़ों पर सवाल उठाए। इसी दौरान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत की जीडीपी पद्धति को ‘सी’ ग्रेड दिया।

रिपोर्ट में बताया गया है कि 2005 से 2011 के बीच उच्च विकास वाले वर्षों में वृद्धि दर को औसतन 1 से 1.5 प्रतिशत अंक कम आंका गया हो सकता है, जबकि 2012 से 2023 के बीच वृद्धि को लगभग 1.5 से 2 प्रतिशत अंक अधिक दिखाया गया हो सकता है।

इन समायोजनों के बाद, रिपोर्ट यह संकेत देती है कि भारत की अर्थव्यवस्था ने एक समान गति से वृद्धि नहीं की, बल्कि 2000 के दशक के मध्य में तेज़ उछाल के बाद वैश्विक वित्तीय संकट और घरेलू झटकों के चलते विकास दर धीमी हुई।

अपने इन दावों के लिए रिपोर्ट दो प्रमुख कारणों की ओर इशारा करती है। इनमे पहला है अनौपचारिक क्षेत्र का आकलन, औपचारिक क्षेत्र के आंकड़ों का उपयोग अनौपचारिक क्षेत्र के लिए किया गया, जबकि नोटबंदी, जीएसटी और कोविड-19 जैसे झटकों का असर असंगठित क्षेत्र पर अधिक पड़ा।

और दूसरा यह की कई क्षेत्रों में उत्पादन मूल्य के बजाय वस्तुओं की कीमतों (जैसे तेल) पर आधारित सूचकांकों का उपयोग किया गया, जिससे वास्तविक वृद्धि का आकलन प्रभावित हुआ।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि 2015 के बाद जीडीपी आंकड़ों और अन्य आर्थिक संकेतकों जैसे निर्यात, क्रेडिट और औद्योगिक उत्पादन, के बीच संबंध कमजोर हुआ, जो मापन से जुड़ी चुनौतियों की ओर संकेत करता है।

रिपोर्ट साथ ही यह भी मानती है कि भारत जैसे विशाल और विविध अर्थव्यवस्था में जीडीपी वृद्धि की तुलना अन्य संकेतकों से करना जटिल हो सकता है, क्योंकि अलग-अलग क्षेत्रों का प्रदर्शन समग्र रुझानों से अलग हो सकता है। समय के साथ अर्थव्यवस्था में बदलाव आने पर इन संकेतकों और जीडीपी के बीच संबंध भी कमजोर पड़ सकते हैं, जिससे सटीक आकलन चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

समय के साथ अर्थव्यवस्था में बदलाव आने पर इन संकेतकों और जीडीपी के बीच संबंध भी कमजोर पड़ सकते हैं, जिससे सटीक आकलन चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन निष्कर्षों के बावजूद भारत वैश्विक स्तर पर सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, जैसे IMF ने भी हाल के वर्षों में भारत की विकास दर को उच्च बनाए रखने का अनुमान जताया है 6% या उससे अधिक की श्रेणी में रखा है।

स्रोत:Others
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