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जयपुर शाही संग्रह का 17वीं सदी का दुर्लभ एस्ट्रोलेब लंदन में नीलामी के लिए पेश होगा
एस्ट्रोलेब धातु की कई परतों से बना एक खगोलीय उपकरण होता है, जिसका उपयोग समय बताने, तारों की स्थिति जानने और मक्का की दिशा निर्धारित करने के लिए किया जाता था।
जयपुर शाही संग्रह का 17वीं सदी का दुर्लभ एस्ट्रोलेब लंदन में नीलामी के लिए पेश होगा
अक़ा अफ़ज़ल के लिए बनवाया गया एक विशाल और अत्यंत महत्वपूर्ण पीतल का एस्ट्रोलैब

पश्चिमी भारत के जयपुर के शाही संग्रह से जुड़ा 17वीं सदी का एक दुर्लभ पीतल का एस्ट्रोलेब 29 अप्रैल को लंदन में सोथबीस की नीलामी में पेश किया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह अपनी विशालता, उत्कृष्ट कारीगरी और ऐतिहासिक महत्व के कारण बेहद खास माना जा रहा है।

यह एस्ट्रोलेब जयपुर के महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय के शाही संग्रह का हिस्सा था। उनके निधन के बाद यह उनकी पत्नी गायत्री देवी महारानी गायत्री देवी को विरासत में मिला। बाद में उनके जीवनकाल में इसे एक निजी संग्रह में स्थानांतरित कर दिया गया।

एस्ट्रोलेब धातु की कई परतों से बना एक खगोलीय उपकरण होता है, जिसका उपयोग समय बताने, तारों की स्थिति जानने, मक्का की दिशा निर्धारित करने और आकाशीय पिंडों की गति को समझने के लिए किया जाता था।

इस उपकरण की अवधारणा दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में प्राचीन यूनानी खगोलविदों ने विकसित की थी। बाद में 8वीं शताब्दी तक यह इस्लामी दुनिया में पहुंचा, जहां इसमें महत्वपूर्ण सुधार किए गए। इसके बाद इराक, ईरान, उत्तरी अफ्रीका और वर्तमान स्पेन के अल-अंदलुस जैसे क्षेत्रों में इसका निर्माण प्रमुख रूप से होने लगा।

यह विशेष एस्ट्रोलेब 17वीं सदी की शुरुआत में लाहौर में तैयार किया गया था, जो उस समय मुगल साम्राज्य के तहत एक प्रमुख निर्माण केंद्र था। इसे भाइयों क़ाइम मुहम्मद और मुहम्मद मुकीम ने बनाया था।

इसका निर्माण मुगल अधिकारी आका अफज़ल के आदेश पर किया गया था, जिन्होंने सम्राट जहांगीर और शाहजहाँ के शासनकाल में सेवा दी थी। यह वस्तु उस दौर की वैज्ञानिक प्रगति और शाही संरक्षण दोनों को दर्शाती है।

सोथबीस के इस्लामिक और भारतीय कला विभाग के प्रमुख बेनेडिक्ट कार्टर के अनुसार, इसका वजन 8.2 किलोग्राम है, व्यास लगभग 30 सेंटीमीटर है और ऊंचाई करीब 46 सेंटीमीटर है। यह 17वीं सदी के भारत के सामान्य एस्ट्रोलेब की तुलना में लगभग चार गुना बड़ा है।

इस पर 94 शहरों के नाम और उनके भौगोलिक निर्देशांक अंकित हैं। साथ ही इसमें कई तारों के संकेतक और बेहद जटिल सजावटी पैटर्न भी मौजूद हैं।

फारसी और संस्कृत दोनों भाषाओं में मौजूद शिलालेख इसके सांस्कृतिक मेलजोल को दर्शाते हैं, जबकि इसकी सूक्ष्म रूप से संतुलित संरचना अत्यंत सटीक खगोलीय माप संभव बनाती है।

स्रोत:AA
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