सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारत में लगातार घटती प्रजनन दर और पिछले कुछ दशकों में हुए जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण दो से अधिक बच्चे होने पर लोगों को दंडित करने वाले कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं।
बुधवार, 4 नवंबर को दिए गए एक फैसले में न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ऐसे कानूनों का मूल आधार अत्यधिक जनसंख्या बढ़ने की आशंका थी, लेकिन देश की बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों के कारण यह आधार अब कमजोर पड़ चुका है।
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने 37 पन्नों के अपने फैसले में दो बच्चों की सीमा से संबंधित दंडात्मक कानूनी प्रावधानों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “हमारा दृढ़ मत है कि दो से अधिक बच्चे होने पर दंडित करने वाले कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। ऐसे कानूनों की बुनियाद, यानी अत्यधिक जनसंख्या बढ़ने का डर, पिछले कुछ दशकों में हुए जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण ढह चुकी है।”
पीठ ने कहा कि ऐसे कानून उस समय की जनसंख्या संबंधी चिंताओं पर आधारित थे, जब तेज जनसंख्या वृद्धि को एक बड़ी चुनौती माना जाता था।
हालांकि, भारत की प्रजनन दर में आई गिरावट ने इन कानूनों के औचित्य पर नए सवाल खड़े किए हैं।
प्रजनन दर से आशय एक महिला द्वारा अपने जीवनकाल में औसतन जन्म दिए जाने वाले बच्चों की संख्या से है।
भारत में पिछले कई दशकों के दौरान प्रजनन दर में गिरावट आई है।
जनसांख्यिकीय परिवर्तन के इस दौर में परिवारों का औसत आकार छोटा हुआ है और जनसंख्या वृद्धि की गति में भी बदलाव आया है।
इन्हीं परिवर्तनों के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने दो से अधिक बच्चे होने पर दंड लगाने वाले कानूनों की आवश्यकता पर सवाल उठाया।
भारत के विभिन्न राज्यों में कुछ कानूनी प्रावधान दो से अधिक बच्चे होने को विशेष पदों या अवसरों के लिए अयोग्यता से जोड़ते रहे हैं।
ऐसे प्रावधानों का उद्देश्य जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी इन कानूनों के पीछे मौजूद जनसंख्या संबंधी तर्क की बदलती प्रासंगिकता पर केंद्रित है।
हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट के अंश से यह स्पष्ट नहीं होता कि अदालत ने किसी विशिष्ट कानून को निरस्त किया है या केवल उसकी मौजूदा आवश्यकता और औचित्य पर टिप्पणी की है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इस बात की ओर संकेत करती है कि जनसंख्या से संबंधित कानूनों और नीतियों का मूल्यांकन बदलती परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।
अदालत के अनुसार, पिछले कुछ दशकों के दौरान भारत में हुए जनसांख्यिकीय बदलावों ने अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि के उस डर को कमजोर कर दिया है, जिसके आधार पर दो बच्चों की सीमा से संबंधित दंडात्मक प्रावधान बनाए गए थे।




















