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चुनौतियों के बीच नेतन्याहू एक कठिन चुनाव में भाग लेने जा रहे हैं
बंसीधर प्रधान के अनुसार नेतन्याहू का आकलन था कि ईरान की धार्मिक सत्ता कुछ ही दिनों में गिर जाएगी और यह उनके राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी जीत साबित होगी।
चुनौतियों के बीच नेतन्याहू एक कठिन चुनाव में भाग लेने जा रहे हैं
इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू यरूशलेम में मेमोरियल डे के उद्घाटन समारोह में शामिल हुए।

अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमले के बाद ईरान के साथ हुए अमेरिकी समझौते ने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बंसीधर प्रधान ने एक लेख में दावा किया गया है कि नेतन्याहू ने ईरान पर हमले को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक जीत के रूप में पेश करने की कोशिश की थी, लेकिन अब वही घटनाक्रम उनके लिए राजनीतिक और रणनीतिक संकट बन गया है।

बंसीधर प्रधान के अनुसार, जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला शुरू किया, तो पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर पड़ा। हालांकि इजराइल में ईरान को लेकर नेतन्याहू द्वारा वर्षों से बनाए गए खतरे के नैरेटिव के कारण हमले को लेकर एक तरह की राष्ट्रीय सहमति दिखाई दी।

नेतन्याहू का आकलन था कि ईरान की धार्मिक सत्ता कुछ ही दिनों में गिर जाएगी और यह उनके राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी जीत साबित होगी। लेकिन लेख के अनुसार, अमेरिका और इजराइल दोनों ने ईरान की सैन्य और राजनीतिक सहनशीलता को कम करके आंका।

लेख में कहा गया है कि ईरानी शासन ने न केवल 40 दिनों तक युद्ध का सामना किया, बल्कि अगले 60 दिनों तक बातचीत की प्रक्रिया को भी जारी रखा।

बंसीधर प्रधान के अनुसार, 15 जून को हुए अमेरिका-ईरान समझौता ज्ञापन का दुनिया के अधिकतर देशों ने स्वागत किया। इस समझौते का उद्देश्य लड़ाई खत्म करना, होर्मुज जलडमरूमध्य और ओमान की खाड़ी में पारस्परिक नाकेबंदी हटाना और तनाव कम करना था। लेकिन इजराइल इस समझौते का विरोध करने वाला अकेला प्रमुख देश बनकर सामने आया।

इस विश्लेषण के मुताबिक, यह समझौता नेतन्याहू के लिए एक “दुःस्वप्न” की तरह साबित हुआ, क्योंकि इससे ईरान को लेकर उनकी पूरी रणनीतिक कहानी कमजोर पड़ गई।

लेख में कहा गया है कि नेतन्याहू को सबसे बड़ा झटका अमेरिका से मिला। समझौते में इजराइल के प्रमुख उद्देश्यों ईरान में शासन परिवर्तन, ईरान की परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं का विनाश, और हिज्बुल्लाह, हमास तथा हूती समूहों को मिलने वाले ईरानी समर्थन को खत्म करने—का उल्लेख नहीं था।

अमेरिका ने लगातार बमबारी के बाद भी अंततः कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दी, जबकि इजराइल सैन्य समाधान पर अड़ा रहा। लेख के अनुसार, लंबी बातचीत की प्रक्रिया से नेतन्याहू को लगभग पूरी तरह अलग रखा गया।

नेतन्याहू आगामी चुनावों में ईरान और हिज्बुल्लाह पर जीत के दावे के साथ उतरना चाहते थे, लेकिन हालिया सर्वेक्षण विपक्ष को बढ़त दिखा रहे हैं। एक सर्वेक्षण में विपक्ष को 61 सीटें और नेतन्याहू गठबंधन को 49 सीटें मिलने का अनुमान बताया गया है।

पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक ने भी चेतावनी दी है कि अगर नेतन्याहू लेबनान में सैन्य तनाव बढ़ाकर चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें सत्ता से हटाया जाना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लेख में नेतन्याहू को बेहद अलग-थलग नेता बताया गया है। गाजा में फिलिस्तीनियों के खिलाफ युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोपों को लेकर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने उनके खिलाफ वारंट जारी किया है।

स्रोत:Other
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